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दयानंद सरस्वती की जीवनी - विचार ,सिद्धांत ,दर्शन

दयानंद सरस्वती की जीवनी 

दयानंद सरस्वती के राजनीतिक विचार

दयानंद सरस्वती के दार्शनिक विचार

दयानंद सरस्वती के गुरु का नाम 

दयानंद सरस्वती बायोग्राफी 

दयानंद सरस्वती की पुस्तकें

दयानंद सरस्वती-सत्यार्थ प्रकाश

दयानंद सरस्वती इन हिंदी

 दयानंद सरस्वती का शिक्षा दर्शन 

आर्य समाज के संस्थापक 

स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 

स्वामी दयानंद सरस्वती का वास्तविक नाम

स्वामी दयानंद सरस्वती MPPSC 


दयानंद सरस्वती की जीवनी


स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म -


जन्म - 1824 - गुजरात
बचपन का नाम - मूल शंकर
आर्य समाज की स्थापना -1875

स्वामी दयानंद सरस्वती की पुस्तकें -


सत्यार्थ प्रकाश
पाखंड खंडन
 वेद भाष्य भूमिका
 ऋग्वेद भाष्य
 अद्वैत मत का खंडन
 त्रेत वाद का समर्थन

 स्वामी दयानंद सरस्वती के सामाजिक विचार-


1. जाति वर्ण संबंधित विचार
2. स्त्री संबंधित विचार
3.धार्मिक आडंबर का खंडन

स्वामी दयानंद सरस्वती के दार्शनिक विचार-


1. वैदिक ज्ञान
2. कर्म सिद्धांत
3.पुनर्जन्म सिद्धांत
4.ईश्वर जीव संबंध


स्वामी दयानंद सरस्वती के सामाजिक विचार-:-


 दयानंद सरस्वती वैदिक युग को ही आदर्श युग मानते थे, अतः उन्होंने जन्म आधारित जाति व्यवस्था का विरोध किया ,तथा कर्म के आधार पर एवं वेदों के अनुकूल वर्ण निर्धारण का समर्थन किया ,
वे " दलितों  के उद्धार " के पक्षधर थे, उनका मानना था कि जाति व्यवस्था से योग्यता का हनन होता है तथा समाज में भेदभाव व शोषण को बढ़ावा देता है। 
जाति के कारण ही समाज में आपसी संबंध दुष्ट प्रभावित हुए ,
अतः जाति के स्थान पर वर्ण व्यवस्था की स्थापना की जानी चाहिए ।


           दयानंद सरस्वती स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे ,तात्कालिक समय में स्त्री विरोधी परंपराओं के विरोधी थे उनका मानना था कि स्त्रियों को वैदिक युग के समान सम्मान एवं अधिकार प्राप्त होने चाहिए तथा ,स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध चल रही कुप्रथा है जैसे -बाल विवाह, सती प्रथा आदि को समाप्त किया जाना चाहिए ,व विधवा विवाह की प्रथा को अपनाया जाना चाहिए,

 दयानंद सरस्वती ने इस्लाम धर्म ईसाई धर्म व हिंदू धर्म आदि का आलोचनात्मक अध्ययन किया और इन धर्मों में व्याप्त आडम्बरो  का खुलकर विरोध भी किया 

अपने महान ग्रंथ " सत्यार्थ प्रकाश "में स्वामी ने सभी धर्मों में व्याप्त बुराइयों का खंडन किया ,वह मूर्ति पूजा व बहू देव वाद  का विरोध करते थे ,उनका मानना था कि उन धार्मिक  आडम्बरो का निर्माण पुरोहित ने अपने स्वार्थ के लिए किया है ,और इन आडंबर ओं के कारण धर्म का पतन हुआ है। अतः इन आडंबर को समाप्त किया जाना चाहिए ,
व वैदिक रीति रिवाज से धर्म का पालन किया जाना चाहिए।

स्वामी दयानंद सरस्वती के सामाजिक विचार mppsc

 स्वामी दयानंद सरस्वती के दार्शनिक विचार-



       दयानंद सरस्वती के दर्शन पर वैदिक दर्शन का गहरा प्रभाव था ,वह केवल वेदों को ही प्रमाणिक मानते थे और वैदिक सत्ता की स्थापना पर जोर देते थे ,क्योंकि पौराणिक धर्म की "पौंगा -पंथी" में कोई सार नहीं है ,स्वामी जी के दर्शन में हमें बुद्धि वाद की झलक मिलती है ,क्योंकि वह उसी बात को स्वीकार करने पर बल देते हैं जो बुद्धि के अनुकूल हो।

            दयानंद सरस्वती ईश्वर को इस संसार का निमित्त कारण मानते हैं ,और उन्होंने ईश्वर को एक सक्रिय सृजन  कर्ता के रूप में स्वीकार किया है ,दयानंद सरस्वती इस संसार को भ्रम ना मानकर वास्तविक मानते हैं, वे कहते हैं कि इस संसार का स्वतंत्र व उद्देश्य पूर्ण अस्तित्व है ,तथा वे जीव के अस्तित्व को भी स्वीकार करते हैं और वह कहते हैं कि इस संसार में जीव कर्म करने हेतु पूर्णता स्वतंत्र है परंतु फल भुगतने हेतु परतंत्र हैं।

 ईश्वर को कर्म फल का दाता मानते हैं और वे कहते हैं कि जो जो इस संसार में जैसे कर्म करता है उसे ईश्वर द्वारा उसी प्रकार का फल प्रदान किया जाता है ,और इन फलों के आधार पर ही मनुष्य का पुनर्जन्म होता है।

       दयानंद सरस्वती त्रैतवाद के समर्थक थे -अर्थात् वे ईश्वर ,संसार, एवं जीव की प्रथक प्रथक सत्ता स्वीकार करते थे।

दयानंद सरस्वती ने सभी धर्मों का आलोचनात्मक अध्ययन करने के बाद वेदों की सत्ता को सर्वोपरि माना और वेदों की ओर लौटो का नारा दिया




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