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राम मनोहर लोहिया जी के प्रमुख विचार

राम मनोहर लोहिया जी के प्रमुख विचार,

राम मनोहर लोहिया जी के आर्थिक विचार,

राम मनोहर लोहिया जी के सामाजिक विचार,

राम मनोहर लोहिया जी के राजनीतिक विचार,

 राम मनोहर लोहिया जी की चौखंबा राज्य की विचारधारा,

राम मनोहर लोहिया -MPPSC 


राम मनोहर लोहिया जी  पर निबंध 


राम मनोहर लोहिया जी के प्रमुख विचार




जन्म  - 23 मार्च 1910 
(उत्तर प्रदेश के फैजाबाद के अकबरपुर) में हुआ था 
इनके पिता अध्यापक थे तथा गांधी जी के अनुयाई थे 
लोहिया जी पर गांधीवाद का गहरा प्रभाव था।


राम मनोहर लोहिया जी के प्रमुख विचार


राम मनोहर लोहिया जी के राजनीतिक विचार



1.राजनीतिक नैतिकता का समर्थन
 2.राजनीति के अपराधीकरण के विरोधी
3. राष्ट्रवादी विचारक


राम मनोहर लोहिया जी के आर्थिक विचार


1.समाजवाद के समर्थक

2चौखंबा राज्य की विचारधारा
A. ग्राम
B. मंडल
C. प्रांत
D. राष्ट्र


राम मनोहर लोहिया जी के सामाजिक विचार


1.जाति एवं वर्ग संबंधित विचार (चक्रिय सिद्धांत)
2. स्वदेशी संस्कृति के समर्थक
3. स्व भाषा के समर्थक



राम मनोहर लोहिया जी के राजनीतिक विचार


लोहिया जी राजनीतिक नैतिकता के प्रबल समर्थक थे , वे  राजनीति में नैतिकता को प्रबल रूप से आवश्यक मानते थे ,क्योंकि उनका मानना था कि बिना नैतिकता की राजनीति समाज को उचित दिशा प्रदान नहीं करती, वह एकमात्र ऐसे राजनेता थे जिन्होंने अपनी पार्टी के सरकारी कार्यों की खुलकर आलोचना की साथ ही लोहिया जी " राजनीतिक अपराधीकरण " के प्रबल विरोधी थे ,उनका मानना था कि हिंदुस्तान की राजनीति में शुचिता तभी आएगी जब उसने उच्च व्यक्तित्व व साफ छवि वाले लोग ही सम्मिलित हो ।

            राम मनोहर लोहिया एक राष्ट्रवादी विचारक थे और वे राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते थे उनका मानना था कि राष्ट्र के कल्याण में ही व्यक्ति का कल्याण निहित है अतः प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यक रूप से अपने राष्ट्रीय कर्तव्य की पूर्ति करना चाहिए क्योंकि अधिकार तभी सुरक्षित रहेंगे जब सभी व्यक्ति अपने अपने कर्तव्यों का निर्वहन ईमानदारी पूर्वक करते रहें।


राम मनोहर लोहिया जी के आर्थिक विचार:


- लोहिया जी एक समाजवादी विचारक थे ,वे समाजवाद के विशिष्ट स्वरूप की चर्चा करते थे ,लोहिया जी का मानना था कि भारत की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही यहां के नीति निर्माताओं को नीतियों का निर्माण करना चाहिए।

        लोहिया ने अपनी पुस्तक"समाजवादी नीति के विविध पक्ष " में अपने समाजवादी मॉडल की विस्तृत व्याख्या की है। उनका मानना था कि राष्ट्र  का संगठन 4 परतो ( सतहो) 
  गांव,
  मंडल, 
  प्रांत एवं 
  राष्ट्र 
के अनुसार होना चाहिए ,तभी सभी समुदाय का वास्तविक प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा,
 लोहिया जी ने राष्ट्र के चार स्तंभ के निर्माण की व्याख्या को चौखंबा राज्य कहां है। जैसे चार खंभे अपना पृथक पृथक अस्तित्व रखते हुए भी एक राष्ट्र को संभालते हैं, वैसे ही यह अवधारणा केंद्रीकरण एवं विकेंद्रीकरण की परस्पर विरोधी व्यवस्था में भी सामंजस्य स्थापित करेगी।


लोहिया जी के अनुसार " जिलाधीश का पद समाप्त कर दिया जाना चाहिए क्योंकि यह शक्ति के केंद्रीकरण का प्रतीक है। "

           पुलिस एवं जनकल्याणकारी कार्यों को गांव व नगर की पंचायतों द्वारा शुरू किया जाना चाहिए ,साथ ही प्रांत एवं राष्ट्र को समन्वय एवं निर्देशन की भूमिका निभानी चाहिए।

     लोहिया जी कुटीर उद्योगों के समर्थक थे ,उनका मानना था कि सहकारिता आधारित कुटीर उद्योगों की स्थापना की जानी चाहिए जिसके परिणाम स्वरूप आर्थिक शक्ति का विकेंद्रीकरण होगा और नए रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे ,क्योंकि इसमें सभी लोगों को समान अधिकार होगा आधा उत्पादन में भी वृद्धि होगी परिणाम स्वरुप राष्ट्र कल्याण में श्रमिक कल्याण सुनिश्चित होगा।




राम मनोहर लोहिया जी के सामाजिक विचार:- 


लोहिया जी सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धांत के पक्षधर थे उन्होंने जाति  एवं वर्ग के आधार पर सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा प्रस्तुत की थी ,
लोहिया जी का मानना था कि जाति रूढ़ीवादी शक्ति का प्रतीक है तथा जडता को बढ़ावा देती हैं ,जिसके चलते समाज पुरानी परंपराओं पर ही चलता है तथा विकास नहीं कर पाता है
 जबकि वर्ग  परिवर्तनशील शक्ति का प्रतीक है जो विकास और सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा देता है 

लोहिया जी कहते हैं कि जातियां धीरे-धीरे से शिथिल  होकर वर्गों में बदल जाती हैं तथा वर्ग संगठित होकर जातियों का रूप ले लेते हैं इस प्रकार समाज में परिवर्तन चक्रीय क्रम में होता रहता है।

              राम मनोहर लोहिया पूर्ण रूप से स्वदेशी विचारक थे वे भारतीय संस्कृति एवं उसके प्रतीकों को जिनसे हमारे देश की पहचान मिलती है उनके निरंतरता के पक्षधर थे ,वह अंग्रेजी भाषा के विरोधी व हिंदी भाषा के समर्थक थे उनके द्वारा अंग्रेजी हटाओ आंदोलन भी चलाया गया ,
लोहिया के अनुसार स्वभाषा राजनीति का मुद्दा नहीं बल्कि अपने स्वाभिमान का प्रश्न है।


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