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कौटिल्य के प्रमुख विचार - सप्तांग सिद्धांत /मंडल सिद्धांत

कौटिल्य जिन्हें चाणक्य के नाम से भी जाना जाता है,   कौटिल्य के प्रमुख विचार - सप्तांग सिद्धांत /मंडल सिद्धांत से  संबंधित प्रश्न  एवं कौटिल्य/चाणक्य  के बारे में सामान्य जानकारी से संबंधित प्रश्न लगभग सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते हैं, इस लेख में कौटिल्य एवं उनके प्रमुख विचारों से संबंधित सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का वर्णन आसान भाषा में किया गया है ,इस लेख को पढ़ने के उपरांत विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कौटिल्य से संबंधित प्रश्नों को आसानी से हल किया जा सकेगा,

कौटिल्य के प्रमुख विचार - सप्तांग सिद्धांत /मंडल सिद्धांत
कौटिल्य के प्रमुख विचार - सप्तांग सिद्धांत /मंडल सिद्धांत




कौटिल्य का जन्म - 375 ईसा पूर्व तक्षशिला 
  मृत्यु - 283 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र
प्रमुख रचना अर्थशास्त्र

कौटिल्य का सामान्य परिचय-

कौटिल्य चंद्रगुप्त मौर्य के महामंत्री प्रधानमंत्री थे, प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतकों में कौटिल्य का स्थान सर्वोपरि है। कौटिल्य को शासन कला तथा कूटनीति कला का महान दार्शनिक माना जाता है, कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र राजनीतिक शिक्षा का एक महान ग्रंथ है।

            कौटिल्य का राजनीतिक चिंतन नैतिकता और सुशासन की धारणा पर आधारित है, जो वर्तमान परिपेक्ष में बहुत अत्यधिक प्रासंगिक हैं। कौटिल्य का संपूर्ण दर्शन सामाजिक हित व सार्वजनिक लाभ की अवधारणा पर आधारित है।


कौटिल्य के प्रमुख विचार-MPPSC


1.कौटिल्य के सामाजिक विचार

*सामाजिक न्याय को महत्व
  *नैतिकता को महत्व 

2. कौटिल्य के दार्शनिक विचार 

1.राज्य संबंधित विचार (सप्तांग सिद्धांत)
2. विदेश नीति संबंधित (मंडल सिद्धांत )
3.भ्रष्टाचार संबंधित विचार



 कौटिल्य  के सामाजिक विचार:-


कौटिल्य ने अपने सामाजिक विचारों के अंतर्गत अपने धार्मिक विचारों को प्रस्तुत किया है। उन्होंने धर्म का अर्थ स्व धर्म से लिया है ,अर्थात सनातन हिंदू धर्म में प्रचलित व स्वीकार मान्यता की "धर्म कर्तव्यों की व्यवस्था है" को स्वीकार किया है।

              कौटिल्य  धर्म को तीन भागों में विभाजित करते हैं-
1.वर्ण धर्म अर्थात अपने वर्ण के अनुसार कार्य
2.आश्रम धर्म अर्थात अपने आश्रम के अनुसार कार्य
3.राजधर्म अर्थात राजा और प्रजा दोनों को अपने राज्य से संबंधित कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए।

            कौटिल्य कुछ मामलों में स्त्री वह पुरुष समानता के पक्षधर थे जैसे विवाह विच्छेद के समय और वैवाहिक कार्यों में स्त्री व पुरुष में समानता होनी चाहिए तथा साथ ही स्त्री वध एवं ब्राह्मण वध को गंभीर अपराध माना है, क्योंकि इनके दर्शन पर मनु का प्रभाव था, अतः यह राजनीतिक, आर्थिक मामलों में स्त्री व पुरुष के मध्य समानता के पक्षधर नहीं थे।

          कौटिल्य ने सामाजिक न्याय एवं कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का विकास किया है, उनके अनुसार राज्य का यह दायित्व है कि अनाथो,निर्धन और दिव्यांगों की सहायता व स्त्री सम्मान की रक्षा व अधिकारो को महत्व देते हुए, बांधो तालाबों और सड़कों एवं सिंचाई सुविधाओं आदि लोक कल्याणकारी कार्यों को भी करें। क्योंकि कौटिल्य का मानना था कि प्रजा की प्रशंसा में ही राजा की प्रसन्नता है ,प्रजा के लिए जो कुछ भी लाभकारी है उससे राजा का भी लाभ होता है।



 कौटिल्य  के राजनीतिक विचार:-

कौटिल्य ने अपने पूर्व के राजनीतिक चिंतकों द्वारा प्रतिपादित राज्य के संबंध में विचारों से अलग हटकर राज्य की देवीय सिद्धांत के स्थान पर सामाजिक समझौते के सिद्धांत का समर्थन किया। 

कौटिल्य राज्य की उत्पत्ति से पूर्व की प्राकृतिक दशा को अराजकता की संज्ञा देते हैं ,कौटिल्य के अनुसार राज्य की उत्पत्ति तब हुई है, जब मत्स्य न्याय के कानून से तंग आकर लोगों ने मनु को अपना राजा चुना तथा अपनी कृषि उपज का छठवां भाग तथा स्वर्ण का दसवां भाग मनु को देना स्वीकार किया ,इसके बदले में राजा ने उनकी सुरक्षा तथा कल्याण का उत्तर दायित्व संभाला।

               कौटिल्य राजतंत्र के समर्थक थे और उन्होंने राज्य की तुलना मानव शरीर से की तथा राज्य को  सावयव रूप को स्वीकार किया।


कौटिल्य का सप्तांग सिद्धांत 


                  कौटिल्य के अनुसार राज्य के सभी तत्व मानव शरीर के अंगों के समान परस्पर संबंधित आत्मनिर्भर तथा मिलजुल कर कार्य करते हैं इस संबंध में वे सप्तांग सिद्धांत देते हैं।
कौटिल्य के प्रमुख विचार - सप्तांग सिद्धांत /मंडल सिद्धांत


1. राजा( स्वामी):- यह राज्य का  सिर है,अतःराजा कुलीन, बुद्धिमान ,साहसी ,धैर्यवान, संयमी, दूरदर्शी तथा युद्ध कला में निपुण होना चाहिए।

2. अमात्य (मंत्री):-यह राज्य की आंखें होती है, यह अपने ही देश के नागरिक होने चाहिए जिनमें चरित्रवान, स्वामी भक्त व योग्यता की गुण होने चाहिए।

3. जनपद (जनसंख्या/भूमि):-यह राज्य के पैर (जंघा) होती है जिन पर राज्य का अस्तित्व टिका होता है ,प्रजा को स्वामी भक्ति परिश्रमी तथा राजा की आज्ञा का पालन करने वाला होना चाहिए।

4. दुर्ग (किला):-यह राज्य की भुजाएं होती हैं जिनका कार्य राज्य की रक्षा करना है। ऐसे किलो का निर्माण करना चाहिए जो आक्रामक युद्ध हेतु व रक्षात्मक दृष्टि से लाभकारी हो।

5. कोष (राजकोष):-यह राज्य के मुख्य समान है कोष को राज्य का सबसे महत्वपूर्ण तत्व माना गया है, तथा संकट काल में राजा को राजस्व प्राप्ति हेतु अनुचित तरीके भी अपनाना चाहिए।

6. दंड (सेना):-यह राज्य का मस्तिष्क है प्रजा तथा शत्रु पर नियंत्रण करने के लिए बल अथवा सेना अत्यधिक आवश्यक तत्व है।

7. मित्र:- यह राज्य के कान होते हैं राजा के मित्र युद्ध और शांति काल दोनों में ही उसकी सहायता करते हैं।



 कौटिल्य का मंडल सिद्धांत



        कौटिल्य ने विदेश नीति से संबंधित विचारों को अपने मंडल सिद्धांत में प्रतिपादित किया है,मंडल सिद्धांत के अंतर्गत विजय की इच्छा रखने वाले राजा को अपने चारों ओर के राजाओं को मिलाकर एक ऐसा मंडल विकसित करना चाहिए जो युद्ध के समय राजा की सहायता करें।
           कौटिल्य का यह मंडल सिद्धांत यथार्थवाद पर आधारित है जो युद्ध को अंतरराष्ट्रीय संबंधों की वास्तविकता मानकर संधि व समझौते के द्वारा शक्ति संतुलन बनाने पर बल देता है।



 कौटिल्य के भ्रष्टाचार संबंधित विचार


              कौटिल्य प्रशासन में भ्रष्टाचार के संबंध में विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हैं। कौटिल्य के अनुसार प्रशासनिक भ्रष्टाचार प्रशासन को अंदर ही अंदर से कमजोर करता है। अतः इसकी जांच और  निदान करना प्रमुख कार्य है,
 भ्रष्टाचार से प्रशासन के नैतिक मूल्यों का पतन होता है और कौटिल्य पूर्णता वादी नीतिशास्त्र के समर्थक थे अतः पर भ्रष्टाचार को राज्य के लिए एक बीमारी मानते थे।

                  कौटिल्य का मत था कि प्रशासन में भ्रष्टाचार की जांच करना उतना ही कठिन कार्य है, जितना कि यह पता लगाना कि तालाब में किस मछली ने पानी पिया है और किसने नहीं ,साथ ही भ्रष्टाचार, जीभ पर रखे उस शहद के समान है जिसको चाहे या ना चाहते हुए भी स्वाद  हर  कोई ले लेता है,
 अतः भ्रष्टाचार का निदान कठोर कानूनों के द्वारा ही किया जा सकता है, इसके लिए कौटिल्य प्रत्येक विभाग हेतु गुप्त चरो की बात करते हैं जो राजा के अति विश्वसनीय व ईमानदार व्यक्ति होते हैं। 
इन गुप्त चोरों के द्वारा दी गई सूचनाओं के आधार पर कार्यवाही करके भ्रष्टाचार को नियंत्रित किया जा सकता है। केवल कानून बनाने मात्र से भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कर पाना संभव नहीं है।

 यदि वर्तमान परिस्थितियों को देखा जाए तो कौटिल्य के विचार प्रासंगिक हैं जैसे कि विसलब्लोअर एक्ट कौटिल्य के गुप्तचर सिद्धांत को चरितार्थ करता है। साथ ही वर्तमान समय में प्रत्येक विभाग में उजागर होने वाले घोटालों कौटिल्य के भ्रष्टाचार के संबंध में दी गई अवधारणा को मजबूती प्रदान करते हैं।

               अगर भ्रष्टाचार के निदान हेतु कौटिल्य के उपायों को यदि निष्ठा पूर्वक अपनाया जाए तो भ्रष्टाचार पर काफी हद तक नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है।


            कौटिल्य के प्रमुख विचार - सप्तांग सिद्धांत /मंडल सिद्धांत 

               भारत के महान दार्शनिक /विचारक/समाज सुधारक 





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