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अरविन्द घोष के सामाजिक विचार


अरविन्द घोष के सामाजिक विचार,

अरविन्द घोष की प्रमुख पुस्तकें,

अरविन्द घोष के दार्शनिक विचार,

अरविन्द घोष के राजनीतिक विचार,

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अरविन्द घोष पर निबन्ध 

अरविन्द घोष से सम्बंधित प्रश्नोत्तर 





अरविन्द घोष का जन्म -15 अगस्त (1872 कोलकाता)

अरविन्द घोष की प्रमुख पुस्तकें


 ➥एसेस ऑफ गीता
 ➥सावित्री
➥लाइफ डिवाइडिंग 
➥वेदांत दर्शन
➥राजयोग
➥विवेकानंद कर्म योग



अरविन्द घोष के सामाजिक विचार /अरविन्द घोष के राजनीतिक विचार 


1. धर्म संबंधी राष्ट्रवाद

2. समानता के पक्षधर

3.उपनिवेश के विरोधी

4. अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रवाद


अरविन्द घोष के दार्शनिक विचार


1. वेदांत दर्शन (जड़ चेतन)
2. निर्गुण निराकार ईश्वर( ब्रह्मा)


 अरविन्द घोष के सामाजिक विचार


         महर्षि अरविंद राष्ट्रवादी विचारक थे, उन्होंने "देवीय/ आध्यात्मिक राष्ट्रवाद" के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। 
महर्षि अरविंद का मानना था कि राष्ट्रवाद एक राजनीतिक क्रियाकलाप ना होकर मनुष्य का धर्म है। 
अर्थात प्रत्येक मनुष्य के जो कर्म है वे राष्ट्र के प्रति समर्पित होने चाहिए और उनका पालन एक धर्म के रूप में किया जाना चाहिए 

इस धर्म का प्रधान हथियार उन्होंने अध्यात्म को माना है।

         अरविंद के दर्शन पर वेदांत दर्शन का प्रभाव था ,वह  किसी भी प्रकार के भेदभाव को नहीं स्वीकारते थे
 वे सभी को समान मानते थे ,तथा इसी के चलते महर्षि अरविंद ने " उपनिवेशवाद "की खुलकर आलोचना की 

चूकिं  उपनिवेशवाद के अंतर्गत एक देश की सरकार के द्वारा दूसरे देश की जनता के साथ भेदभाव किया जाता है अतः किसी भी रूप में उपनिवेशवाद स्वीकार योग्य नहीं है। चाहे वह आर्थिक उपनिवेश हो या राजनीतिक उपनिवेश हो।

        महर्षि अरविंद ने अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रवाद का समर्थन किया उनका मानना था कि प्रत्येक राष्ट्र के लोगों को अपने राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव रखना चाहिए और जो कर्तव्य राष्ट्र के प्रति हैं उन्हें प्राथमिकता के साथ पूरा करना चाहिए।


 अरविन्द घोष के दार्शनिक विचार 



          महर्षि अरविंद के दर्शन पर वेदांत व गीता का प्रभाव स्पष्ट रूप से था ,
महर्षि अरविंद, शंकराचार्य की भांति यह भी स्वीकारते हैं कि परम सत्ता एक है और यह सभी जड़ और चेतन सत्ताओं  का सत्य है और यह परम सत्य प्रत्येक तत्व में समान रूप से निहित होती है ,
 संसार में जो भी जड़ चेतन सत्ता है ,वे एक दूसरे के विरोधी ना होकर एक दूसरे की पूरक है ,अर्थात वे एक दूसरे की कमियों को पूरा करती है ।

            महर्षि अरविंद वेदांत दर्शन के निर्गुण निराकार ब्रह्म को स्वीकार करते हैं, वे गीता दर्शन से प्रभावित थे ,उनका मानना था कि भगवत गीता मानव जाति का एक सच्चा ग्रंथ है ,जो पुस्तक से कहीं अधिक एक जीवंत रचना है, जिससे हर आयु  वर्ग के लिए व सभ्यता के लिए नया अर्थ है।



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